Poemकविता
सभी जगहें वहीं हैं
अँधेरे की सभी जगहें वहीं हैंबरगद का चबूतरा वहीं है,जो घुप्प अँधियारे में अपना एकांत पकड़ कर सो जाता है।वो काली ठंडी गलियाँ वहीं हैं,जहाँ दबे क़दम रेंगकर कुछ तस्दीक करते गुज़रे थे।वो हॉस्टल की बालकनी वहीं है,अभी ओस खा रही होगी,ठिठुर रही होगी शायद।वो सभी एकाकी कमरे वहीं हैं,उधेड़बुन की फुसफुसाहट लिए,बेचैनी लिए,वो भी एक शीतल स्पर्श की आस की नरमाहट में झपकियाँ ले रहे होंगे।एकांत की सभी जगहें वहीं हैं।
कुछ भी नहीं बदलेगा,सैकड़ों-सैकड़ों सालों तक।कुछ भी नहीं।दण्डकारण्य वहीं रहेगा,बृहदारण्य वहीं रहेगा,वो कोमल उष्मा वहीं रहेगी,जहाँ याज्ञवल्क्य ने प्रेम किया था मैत्रेयी से —मुक्त करके।मुक्ति की सभी जगहें वहीं हैं।
आँगन कहीं नहीं जाएगा,ना लचकती मेंड़ें,महुआ और आम महकते रहेंगे,चाहे क्रूर निर्दयता और पतित मानवता उन्हें कितनी भी झुलसाए,कितने भी अप्रेम के महानगर बसें, मशीनें गड़गड़ाती रहें,रोज़मर्रा की कसाहट जितनी भी सोख डाले तुमसे,करुणा के दो करुण कण,आराम के दो स्वार्थी क्षण —भूलना मत कभी,दमन से याद रखना, शक्ति से।प्रेम की सभी जगहें वहीं हैं।