Poemकविता
दीवार में एक खिड़की रहती है
विनोद कुमार शुक्ल की ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ को समर्पित
एक अलग दुनिया होगीएक मकान होगाजिसके दरवाज़े और खिड़कियाँहाथों के स्पर्श से नहींचेतना की छुअन से खुलते हैं।
उस खिड़की से उतरकरहम शायद उतर पाएंगे वहाँजहाँ अनवरत साम्य है।
जहाँ नदियाँ, पर्वत, झरने और पहाड़ हैं।समय क्रूर नहीं है,काल नहीं है।
किसी पेड़ की ओट में टिककरआप मृत्यु तक वहाँ बैठ सकते हैं।किसी तालाब के किनारे पररोम-रोम तक नहा सकते हैं।
जहाँ सभ्यता और संस्कृति के परे हमजी सकते हैं।निरंतर जीवन की क्रूर परिक्रमा कोतोड़करकहीं हम अपने जीवन में रह सकते हैं।
शायद यही मानकरभले यह पूरा सच न हो,एक परिकल्पना हो, आभास हो,मान्यता होया भ्रांति हो।
किन्तु इस भ्रम के फेर में ही ज़िंदगी बहती है।दीवार में एक खिड़की रहती है।