Rohit Shah

Poemकविता

चेहरा तुम्हारा

चेहरा तुम्हारा शाम हैयाद सुबह हो आता हैऔर रात बीतते-बीतते बूढ़ा होता चला जाता है।मेरी उम्र की तरहसमय की तरह।
चेहरा तुम्हारा रौशनी हैजो मुझे भी रौशन करती हैऔर इस बयाबान मेंकुछ क्षणों का निर्वाणजाने कहाँ से भरती है।
चेहरा तुम्हारा उदासी है,जो मुझे काले घिरते सावन की हल्की सिरहाती हवाओं की तरहउस एकाकीपन के अतल तक ले जाता हैजो शायद नियति है।
आँसू तुम्हारे मोती हैंजो मैं उस अतल से उठाकरअपने हाथ में बँधे धागे से पिरो लेता हूँ।
चेहरा तुम्हारा मैं हूँवो दैत्य हैजो तुम्हारी आँखों से मुझे दिखता है।जो रातभर हमारी नींद कोछुपकर कोने से देखता है,वो जो कभी नहीं सोता है।
चेहरा तुम्हारा मजबूरी हैमेरी मजबूरी हैहम सबकी मजबूरी हैजो हर जीते-जागते आदमी की पतंग काट देती है।जो एक भीषण विध्वंस रह-रह के उमड़ने के लिएहमारे हिस्सों में बाँट देती है।
चेहरा तुम्हारा पायल हैजो तुम्हारे बाद भी खनकता रहेगा।मेरे मन के किसी कोने मेंबजता रहेगा,मेरी काली घनी रातों मेंथिरकता रहेगा।
रोहित शाह