Rohit Shah

Poemकविता

बढ़ चला मैं

बढ़ चला मैं,उठाया हुआ माथा अपनादहकते सूरज की ओर,और एक द्रवित करती-सीआत्मस्वीकृति से संतुष्टमैं चल दिया।
मुट्ठी में बाँधी धूलउस रेगिस्तान की,जहाँ पर तुम्हें जलाया था,जहाँ अपने घुटनों पर बैठकतरा-कतरा रोया था,जहाँ आए थे भगवानऔर कंधा सहलाया था।
वहाँ से फिरजोगी-जोगीखंडहर, खेत, खलिहान,पहाड़, मैदान, क्यारियाँ —चलता चला गया।
असंख्य, असंख्य लोग देखे मैंने,और उनके दुख सेदुखी भी हुआ।
हाथ जोड़बैठा अपने बिस्तर पर,और माँग डालीहर वह याचनाजिससे दुनियाबस हँसी-खुशी बीतती जाए।अपने लिएतो माँगा ही नहीं,और फिरनहीं सोचा।
कितना ज़रूरी होता हैआदमी कासैकड़ों-सैकड़ों बारआदमी होते रहना,अपने हृदय कोकितने-कितने टुकड़ों में बाँटना,और किसी एक टुकड़े कोअपने ही भीतर तलाशना।
देखनादुनिया की ज़द्दोजहद,और बसबिना आँसुओं केरो देना।
कितना सुंदर होता हैप्रेम करनाऔर कभी न पाना,और अपने भीतरबहती रग-रग मेंएक खोनेपन के अनुभव कोपाते रहना।
कितना क्रूर है —अनवरत परिक्रमाओं मेंभागते-भागतेकभी-कभीतुम्हारी यादों केखंडहर मेंआते रहना।
रोहित शाह